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However, Kamien delves further into the ways in which music may suggest things, stating that "program compositions draw on music's capacity to suggest and evoke" and listing three ways that this evocation may occur: the imitation of natural sounds, correspondence between musical rhythm and objects in motion, and music's ability to create moods and emotions., Solve Optimization Problems.

Research Paper EditorAbout the Author: Partnership Research Paper

भारतीय इतिहास पर निबंध | Essay on Indian History in Hindi language! ए स्मिथ जैसे विद्वानों ने भी किया है । 11वीं शती के मुस्लिम लेखक अल्वरूनी इससे मिलता-जुलता विचार व्यक्त करते हुए लिखता है- हिन्दू लोग घटनाओं के ऐतिहासिक कम की ओर बहुत अधिक ध्यान नहीं देते । घटनाओं के तिथिक्रमानुसार वर्णन करने में वे बड़ी लापरवाही बरतते है ।किन्तु भारतीयों के इतिहास विषयक गान पर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा लगाया गया उपरोक्त आरोप सत्य से परे है । वास्तविकता यह है कि प्राचीन भारतीयों ने इतिहास को उस दृष्टि से नहीं देखा जिससे कि आज के विद्वान् देखते है । उनका दृष्टिकोण पूर्णतया धर्मपरक था ।उनकी दृष्टि में इतिहास साम्राज्यों अथवा सम्राटों के उत्थान अथवा पतन की गाथा न होकर उन समस्त मूल्यों का संकलन-मात्र था जिनके ऊपर मानव-जीवन आधारित है । अतः उनकी बुद्धि धार्मिक और दार्शनिक ग्रन्थों की रचना में ही अधिक लगी, न कि राजनैतिक घटनाओं के अंकन में ।तथापि इसका अर्थ यह नहीं है कि प्राचीन भारतीयों में ऐतिहासिक चेतना का भी अभाव था । प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययन से यह वात स्पष्ट हो जाती है कि यहाँ के निवासियों में अति प्राचीन काल से ही इतिहास-बुद्धि विद्यमान रही । वैदिक साहित्य, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में अत्यन्त सावधानीपूर्वक सुरक्षित आचार्यों की सूची (वंश) से यह बात स्पष्ट हो जाती है ।वंश के अतिरिक्त गाथा तथा नाराशंसी साहित्य, जो राजाओं तथा ऋषियों के स्तुतिपरक गीत है, से भी सूचित होता है कि वैदिक युग में इतिहास लेखन की परम्परा विद्यमान थी । इसके अतिरिक्त ‘इतिहास तथा पुराण’ नाम से भी अनेक रचनायें प्रचलित थी । इन्हें ‘पंचम वेद’ कहा गया है ।सातवीं शती के चीनी यात्री हुएनसांग ने लिखा है कि भारत के प्रत्येक प्रान्त में घटनाओं का विवरण लिखने के लिये कर्मचारी नियुक्त किये गये थे । कल्हण के विवरण से पता चलता है कि प्राचीन भारतीय विलुप्त तथा विस्मृत इतिहास को पुनरुज्जीवित करने की कुछ आधुनिक विधियों से भी परिचित थे ।वह लिखता हैं- “वही गुणवान् कवि प्रशंसा का अधिकारी है जो राग-द्वेष से मुक्त होकर एकमात्र तथ्यों के निरूपण में ही अपनी भाषा का प्रयोग करता है ।” वह हमें बताता है कि इतिहासकार का धर्म मात्र ज्ञात घटनाओं में नई घटनाओं को जोड़ना नहीं होता । अपितु सच्चा इतिहासकार प्राचीन अभिलेखों तथा सिक्कों का अध्ययन करके विलुप्त शासकों तथा उनकी विजयों की पुन: खोज करता है ।कल्हण का यह कथन भारतीयों में इतिहास-बुद्धि का सबल प्रमाण प्रस्तुत करता है । इस प्रकार यदि हम सावधानीपूर्वक अपने विशाल साहित्य की छानबीन करें तो उसमें हमें अपने इतिहास के पुनर्निर्माणार्थ अनेक महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होगी ।साहित्यिक ग्रन्थों के साथ-साथ भारत में समय-सभय पर विदेशों से आने वाले यात्रियों के भ्रमण-वृत्तान्त भी इतिहास-विषयक अनेक उपयोगी सामग्रियों प्रदान करते है । इधर पुरातत्ववेत्ताओं ने अतीत के खण्डहरों से अनेक ऐसी वस्तुएँ खोज निकाली हैं जो हमें प्राचीन इतिहास-सम्बन्धी बहुमूल्य प्रदान करती हैं ।अत: हम सुविधा के लिये भारतीय इतिहास जानने के साधनों को तीन शीर्षकों में रख सकते हैं: (1) साहित्यिक साक्ष्य ।(2) विदेशी यात्रियों के विवरण ।(3) पुरातत्व-सम्बन्धी साक्ष्य ।यहाँ हम प्रत्येक का अलग-अलग विवेचन करेंगे: (1) साहित्यिक साक्ष्य:इस साक्ष्य के अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक सामग्रियों का अध्ययन किया जाता है ।हमारा साहित्य दो प्रकार का हैं: (a) धार्मिक साहित्य,(b) लौकिक साहित्य ।धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेतर ग्रन्थों की चर्चा की जा सकती है । ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण तथा स्मृति ग्रन्थ आते है, जबकि बाह्मणेतर गुणों में बौद्ध तथा जैन साहित्यों से सम्बन्धित रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है । इसी प्रकार लौकिक साहित्य में ऐतिहासिक ग्रंथों, जीवनियां, कल्पना-प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है ।इनका अलग-अलग विवरण इस प्रकार है: I. वेद: वेद भारत के सर्वप्राचीन धर्म ग्रन्थ है जिनका संकलनकर्त्ता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास को माना जाता है । भारतीय परम्परा वेदों को नित्य तथा अपौरुषेय मानती है। वैदिक युग की सांस्कृतिक दशा के ज्ञान का एकमात्र सोत होने के कारण वेदों का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है । प्राचीन काल के अध्ययन के लिये रोचक समस्त सामग्री हमें प्रचुर रूप में वेदों से उपलब्ध हो जाती है ।वेदों की संख्या चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद । इनमें ऋग्वेद न केवल भारतीय आयी की अपितु समस्त आर्य जाति की प्राचीनतम् रचना । इस प्रकार यह भारत तथा भारतेतर प्रदेशों के आर्यों के इतिहास, भाषा, धर्म एवं उनकी सामान्य संस्कृति पर प्रकाश डालता है । विद्वानों के अनुसार आयी ने इसकी रचना पंजाब में किया था जब वे अफगानिस्तान से लेकर गंगा-यमुना के प्रदेश तक ही फैले थे । इनमें दस मण्डल तथा 1028 सूक्त है ।ऋग्वेद का अधिकांश भाग देव-स्तोत्रों में भरा हुआ है और इस प्रकार उसमें ठोस ऐतिहासिक सामग्री बहुत कम मिलती है । परन्तु इसके कुछ मन्त्र ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करते है । जैसे, एक स्थान पर “दस राजाओं के युद्ध” (दाशराज्ञ) का वर्णन आया है जो भरत कबीले के राजा सुदास के साथ हुआ था । यह ऋग्वैदिक काल की एकमात्र महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है ।यह युद्ध आयी के दो प्रमुख जनों- पुरु तथा भरत के बीच हुआ था । भरत जन का नेता सुदास था जिसके पुरोहित वशिष्ठ थे । इनके विरुद्ध दस राजाओं का एक सध था जिसके पुरोहित विश्वामित्र थे । सुदास ने रावी नदी के तट पर दस राजाओं के इस संघ को परास्त किया और इस प्रकार वह ऋग्वैदिक भारत का चक्रवर्ती शासक बन बैठा ।सामवेद तथा यजुर्वेद में किसी भी विशिष्ट ऐतिहासिक घटना का वर्णन नहीं मिलता । ‘साम’ का शाब्दिक अर्थ है गान । इसमें मुख्यत: यज्ञों के अवसर पर गाये जाने वाले मन्त्रों का संग्रह है । इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है । यजुर्वेद में यज्ञों के नियमों एवं विधि-विधानों का संकलन मिलता है ।जबकि अन्य वेद पद्य में हैं, यह गद्य तथा पद्य दोनों में लिखा गया है । ऐतिहासिक दृष्टि से अथर्ववेद का महत्व रस बात में है कि रस में सामान्य मनुष्यों के विचारों तथा अंधविश्वासों का विवरण मिलता है । इनमें कुल 731 मन्त्र तथा लगभग 6000 पद्य हैं । इसके कुछ मन्त्र ऋग्वैदिक मन्त्रों से भी प्राचीनतर है ।पृथिवीसूक्त इसका प्रतिनिधि सूक्त माना जाता है । इसमें मानव जीवन के सभी पक्षों-गृह निर्माण, कृषि की उन्नति, व्यापारिक मार्गों का गाहन, रोग निवारण, समन्वय, विवाह तथा प्रणय-गीतों, राजभक्ति, राजा का चुनाव, बहुत सी वनस्पतियों तथा औषधियों आदि का विवरण दिया गया है ।कुछ मन्त्रों में जादू-टोने का भी वर्णन है जो इस बात का सूचक है कि इस समय तक आर्य- अनार्य संस्कृतियों का समन्दय हो रहा था तथा आयी ने अनायों के कई सामाजिक एवं धार्मिक रीति रिवाजों एवं विश्वासों को ग्रहण कर लिया था । अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओं का राजा कहा गया है तथा कुरु देश की समृद्धि का अच्छा चित्रण मिलता है । इन चार वेदों को “संहिता” कहा जाता है ।ii., 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